भक्ति की परिपूर्णता ज्ञान वैराग्य के बिना सम्भव नहीं है-आचार्य_
रधुनाथ_दास_शास्त्री
आयुष्मान टाइम्स ( बस्ती)
शिव नगर तुरकहिया में आकाश शुक्ल के द्वारा आयोजित की गई दिव्य श्रीमद् भागवत कथा के अंतर्गत अयोध्या धाम से पधारे आचार्य रधुनाथ दास शास्त्री जी के द्वारा कथा वाचन हुआ । जिसमें महाराज जी ने कहा की भक्ति की परिपूर्णता ज्ञान वैराग्य के बिना सम्भव नहीं है । आगे महाराज जी ने गोकर्ण आत्म देव धुंधकारी की कथा सुनाई जिसमें धुंधकारी एक ब्राह्मण होते हुए भी कुकर्म में रत रहता है और प्रेत बन जाता है । लेकिन श्रीमद्भागवत की कथा सुन कर के उस प्रेत का भी उद्धार हो जाता है । गोकर्ण के जन्म के संबंध में एक कथा विख्यात है। कहा जाता है कि गोकर्ण के पिता आत्मदेव एक विद्वान् और धनवान ब्राह्मण थे। आत्मदेव की पत्नी का नाम धुन्धुली था। ये ब्राह्मण दम्पति संतानहीन थे। एक दिन वह ब्राह्मण संतानचिन्ता में निमग्न होकर घर से निकल पड़ा और वन में जाकर एक तालाब के किनारे बैठ गया। वहाँ उसे एक संन्यासी महात्मा के दर्शन हुए। ब्राह्मण ने उनसे अपनी संतानहीनता का दु:ख बताकर संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महात्मा ने कहा- 'ब्राह्मणदेव! संतान से कोई सुखी नहीं होता है। तुम्हारे प्रारब्ध में संततियोग नहीं है। तुम्हें भगवान के भजन में मन लगाना चाहिये।' ब्राह्मण बोला- 'महाराज! मुझे आपका ज्ञान नहीं चाहिये। मुझे संतान दीजिये, अन्यथा मैं अभी आपके सामने अपने प्राणों का त्याग कर दूँगा।' ब्राह्मण का हठ देखकर महात्माजी ने उसे एक फल दिया और कहा- 'तुम इसे अपनी पत्नी को खिला दो। इसके प्रभाव से तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी।' आत्मदेव ने वह फल ले जाकर अपनी पत्नी धुन्धुली को दे दिया, किंतु उसकी पत्नी दुष्ट स्वभाव की कलहकारिणी स्त्री थी। उसने गर्भधारण एवं प्रसवकष्ट का स्मरण करके फल को अपनी गाय को खिला दिया और पहले से गर्भवती अपनी छोटी बहन से प्रसव के बाद संतान को अपने लिये देने का वचन ले लिया। समय आने पर धुन्धुली की बहन को एक पुत्र हुआ और उसने अपने पुत्र को धुन्धुली को दे दिया। उस पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा गया।
गोकर्ण का जन्म तीन मास के बाद गाय को भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसके शरीर के सभी अंग मनुष्य के थे, केवल कान गाय के समान थे। ब्राह्मण ने उस बालक का नाम गोकर्ण रखा। गोकर्ण थोड़े ही समय में परम विद्वान् और ज्ञानी हो गये। धुन्धुकारी दुश्चरित्र, चोर और वेश्यागामी निकला। आत्मदेव उससे दु:खी होकर और गोकर्ण से उपदेश प्राप्त करके वन में चले गये और वहीं भगवान का भजन करते हुए परलोक सिधारे। गोकर्ण भी तीर्थ यात्रा के लिये चले गये। धुन्धुकारी ने अपने पिता की सम्पत्ति नष्ट कर दी। उसकी माता ने कुएँ में गिरकर अपना प्राण त्याग दिया। उसके बाद धुन्धुकारी ने निरंकुश होकर पाँच वेश्याओं को अपने घर में रख लिया। एक दिन वेश्याओं ने उसे भी मार डाला। धुन्धुकारी अपने दूषित आचरण के कारण प्रेतयोनि को प्राप्त हुआ।
मुस्य यजमान भवानी प्रसाद शुक्ल ने विधिवत पूजन अर्चन करके लोकमंगल की कामना किया ।
चंद्रशेखर त्रिपाठी
आचार्य बाल शरण दास
आचार्य विशाल मिश्रा
आचार्य रवि शंकर पांडे
पंडित विवेक पांडे की भक्तिमयी भजनो से श्रोतागण भक्ति में डूब गये ।
इस मौके पूर्णिमा शुक्ला, आयुष्मान, मान्या, लक्ष्मी नारायण, गायत्री, रतन पाण्डेय, सदीप शुक्ल,राधा रमण त्रिपाठी, देवांश, अनिल शुक्ल, सुरेश, चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव, दयाशंकर सहित इत्यादि श्रोता मौजूद रहे ।


